Sunday, October 2, 2011

गीता - बसंतेश्वरी (BASANTESHWARI)-प्रथम अध्याय-विषादयोग- रचनाकार-प्रो. बसन्त प्रभात जोशी


                                       ऊँ तत् सत्

हे श्री कृष्ण, आपके वचनों ने जो मुझे जीवन रहस्य दिया वह निसन्देह संसार को सदा सदा के लिए आलोकित करे।
                          
       उन्मुक्त हंसी हंस दो भगवान
                        बाल सुलभ कर दो भगवान  
                      
BASANTESHWARI  BHAGWADGEETA
                                                                            रचनाकार -प्रो0 बसन्त प्रभात जोशी      
                                                                                                                             
                     प्रथम अध्याय-विषादयोग

आस लिए रण की जमा, धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र
कर्म किया मम पाण्डु पुत्र क्या, हे संजय तू बोल।। 1।।

व्यूहाकार पाण्डव सेना को, दुर्योधन ने देखकर
जा समीप आचार्य के, वचन कहा वह जान।। 2।।

हे आचार्य देखिये विशाल पाण्डव सैन्य बल
व्यूह है बना गजब, निपुर्ण शिष्य द्युम्न से।। 3।।

पार्थ भीम के समान धनुष लिए शूरवीर
सात्यकी विराट हैं, महारथी द्रुपद स्वयं।। 4।।
धृष्टकेतु चेकितान काशीराजा वीर्यवान
पुरुजित, कुन्तिभोज भी, मनुष्य श्रेष्ठ शैव्य है।। 5।।
पराक्रमी युधामन्यु उत्तमौजा है बली
द्रोपदी सुभद्रा पुत्र, सभी हैं महारथी।। 6।।

हमारी सैन्य में विशिष्ट, आचार्य जान लीजिए
संज्ञान मम सैन्य में, प्रधान जो उन्हें सुनें।। 7।।

एक स्वयं आप हैं, भीष्म कर्ण कृपाचार्य
सोमदत्त पुत्र है, विकर्ण द्रोण पुत्र भी। 8।।
 
आस तजे देह की, और बहुत षूर हैं
भिन्न भिन्न शस्त्र धारी जान चतुर युद्ध में।। 9।।

भीष्म रक्षित सैन्य मम है, सब प्रकार अजेय
भीम रक्षित सैन्य जो है, जीतने में सुगम है।। 10।।

अपनी अपनी ठौर, रहें व्यवस्थित आप
सभी छोर रक्षा करें भीष्म पिता सब वीर ।। 11।।

तब पितामह भीष्म ने दुर्योधन हर्षित किया
सिंहनाद सम गरजकर शंख  बजाया उच्च स्वर ।। 12।।

पणवानक गौमुख सभी, शंख  नगारे साथ
सब बाजे एक साथ ही बड़ा भयंकर बोल ।। 13।।

तब सफेद हय से जुड़े उत्तम  रथ आसीन
माधव श्रीहरि, पार्थ ने दिव्य शंख  बजाये।। 14

पाच्ञजन्य हृषिकेष ने देवदत्त ध्वनि पार्थ
पौण्ड्र बजाया भीम ने जिसके भयकर कर्म।। 15।।
वहाँ युधिष्ठिर ने किया, अनन्त विजय का घोष
मणि पुष्पक सुघोष से, सहदेव नकुल ध्वनि श्रेष्ठ ।। 16।।
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिनृप, और शिखण्डी रथी महान
धृष्टद्युम्न अरु विराट, सात्यकी अजेय वीर।। 17।।
द्रुपद, द्रोपदी के पुत्र, बड़ी भुजा सुभद्रा पुत्र
सभी ने शंख  नाद किया, ओर छोर भूमि में।। 18।।

उस भयानक घोष ने व्याप्त धरा आकाश
हृदय फटा तब सकल सुत, सुना भंयकर घोष ।। 19।।

ठौर व्यवस्थित सुहृद मित्र, देख कपिध्वज पार्थ
शस्त्र  प्रहार उद्यत सकल, धनुष उठाकर पार्थ।। 20
यह बोला श्री कृष्ण से, हे राजन तू जान
उभय सैन्य के बीच रथ, स्थापित भगवान।। 21।।

अपनी ठौर अवस्थित युद्ध काम प्रतिपक्ष
किन किन से रण हो उचित,कर निरीक्ष मैं जान।। 22।।
दुर्योधन  दुर्बुद्धि के प्रिय हितकारक भूप
एकत्र हुए इस युद्ध को, देखूँ उनका रूप।। 23।।

हे राजन श्री कृष्ण ने वचन सुने जब पार्थ
दोनो सेना मध्य में रथ स्थापित कृष्ण।। 24।।
भीष्म द्रोण के सामने और सकल महिपाल
कहा पार्थ से देख ले युद्ध जुटे धातृराष्ट्र।। 25।।

देखे पितृन पिता महान देखे मातुल भ्रातृ
पुत्र पौत्र अरु मित्र को, देखा स्थित पार्थ।। 26।।

दोनो सेना मध्य में श्वसुर सुहृद को देख
देख अवस्थित बन्धु सब, बोला तब कौन्तेय।। 27।।

अति करूणा से युक्त हो, बोला हे नर श्रेष्ठ
सभी स्वजन जो युद्ध प्रिय देख अवस्थित कृष्ण ।। 28।।
शिथिल हो रहे अंग मम, सूख रहा मुख नाथ
रोमांच कम्प इस देह में, हो रहा श्री कृष्ण ।। 29।।

गांडीव गिर रहा हाथ से, त्वचा बहुत ही दाह्य
मन भ्रमित है हो रहा,नहीं पैर स्थिर समर्थ ।। 30।।

सब लक्षण विपरीत हैं, केशव  यह मैं जान
स्वजन हते इस युद्ध में, कुछ भी नहिं कल्याण।। 31।।

नहीं चाहता विजय मैं, नहीं राज्य सुख चाह
क्या होगा इस राज्य से, जीवन से अरु भोग ।। 32।।

हेतु राज्य सुख भोग का, जिनके प्रति है, कृष्ण
त्याग आस इस देह की  वे तत्पर हैं युद्ध।। 33।।
पुत्र पितर आचार्य हैं और पितामह जान
मामा साले श्वसुर हैं और सहोदर पौत्र।। 34।।

मेहि मारें मधुसूदन, मिले त्रिलोकी राज
फिर भी नहिं मारूं इन्हें, पृथ्वी की क्या बात।। 35।।

क्या प्रसन्नता होएगी, इन कुरुवों को मार
आश्रित होंगे पाप के, मार आतंकी कृष्ण।। 36।।

नहीं योग्य हैं, कृष्ण हम, बन्धु स्वजन को मार
कैसे हम सुख पायेंगे, निज कुटुम्ब को मार।। 37।।

भ्रष्ट हुआ चित लोभ से, करते नहीं विचार
कुल क्षय दोष न देखते, मित्र द्रोह का पाप।। 38।। 
हम जानत क्षय दोष कुल, हे जगदीश्वर कृष्ण
क्यों न विचारें इस विषय जिससे पाप निवृत्त।। 39।।

होत नाश कुल जाति का, कुल धर्म सनातन नष्ट
पाप सकल व्यापे तहाँ, होत धर्म के नष्ट ।। 40।।

बड़े पाप दावानल, नारी पापी होंय
नारी दूषित होंय जब, तेहि कुल संकर होय।। 41।।

कुल घाती, कुल नरक में, संकर का परिणाम
पिण्ड श्राद्ध तर्पण नहीं, पितर अधोगति जान।। 42।।

वर्ण संकर दोष से, कुल धातिन अस हाल
जाति सनातन धर्म कुल, होय शीघ्र  ही नाश ।। 43।।

जिनका कुल धर्म नष्ट है, सुनो द्वारिका नाथ
सुना अनिश्चय काल तक, करें  नरक में वास ।। 44।।
राज लोभ से हम यहाँ, स्वजनों का ही घात
महापाप को हम हुए, करने को तैयार।। 45।।

सामना न युद्ध में, शस्त्र  हाथ में नहीं
धातृराष्ट्र मार दें, कल्याणकारी वह कहीं ।। 46।।

रण भूमि में संतप्त अर्जुन सर धनुष को त्यागकर
शोक से उद्विग्न मन ले, बैठ रथ के पृष्ठ में।। 47।।

           

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