Thursday, October 6, 2011

गीता - वसंतेश्वरी-Basanteshwari-बारहवाँअध्याय-भक्तियोग - प्रो बसन्त


                  लोक प्राप्त उद्वेग नहिं जो उद्वेग नहिं जीव
                  अमर्षहर्षउद्वेगभय मुक्त परम प्रिय भक्त।। 


                  बारहवाँअध्याय-भक्तियोग
    
        चित्त निरन्तर थाप तुम, भक्त करे अति प्रेम
ध्यान करें अव्यक्त जो, दोउ में को है श्रेष्ठ।। 1।।

अतिशय श्रद्धा युक्त हो, नित्य युक्त मन रोक
जो भजते नर हरि रूप को वह योगिन में श्रेष्ठ।। 2।।

भजे एक रस नित्य को, अचल अव्यक्त अचिन्त्य
अकथनीय अक्षर परम घट घट वासी जान।। 3।।
वश कर इन्द्रिय को सभी और बुद्धि सम होय
सब भूतों के हित रहे, प्राप्त मुझी को होय।। 4।।

निराकार आसक्त हैं, कठिन परिश्रम जान
दुःखद गती अव्यक्त की देह धारि को जान।। 5।।

सदा परायण भक्त मम, करे समर्पण कर्म
अनन्य योग रत ध्यान जो, मोहि भजे वह सन्त।। 6।।

मम अनुरागी चित्त से करे भक्ति हे पार्थ
मृत्यु संसार समुद्र से करता उनको पार।। 7।।

मुझमें मन अपना लगा और लगा मम बुद्धि
इस कारण मम धाम बस, इसमें संशय नाहिं।। 8।।

यदि समर्थ है तू नहीं, मन मम अचल स्थाय
इच्छा कर मम प्राप्ति की, अभ्यास योग कौन्तेय।। 9।।

अभ्यास योग असमर्थ है, तो कर मम हित कर्म    
मम निमित्त कर कर्म को, सिद्धि प्राप्त तू पार्थ।। 10।।

यदि इसमें असमर्थ है आश्रित मम उद्योग
स्थिर कर मम बुद्धि को, सर्व कर्म फल त्याग।। 11।।
ज्ञान श्रेष्ठ अभ्यास से ध्यान श्रेष्ठ है ज्ञान
सकल कर्म का त्याग ध्यान से,शान्ति त्याग से प्राप्त।। 12।।

द्वेष भाव से रहित जो सब भूतों का मित्र
अहंकार जिसमें नहीं, करुणा जिसके चित्त
सुख दुःख सम है वह सदा और क्षमी है जान।। 13।।
जिसमें ममता है नहीं योगी सदा संतुष्ट
मन इन्द्रिय वश में किया द्रढ़ निश्चय से युक्त
मम अर्पित मन बुद्धि जो, प्रिय है मुझको भक्त।। 14।।

लोक प्राप्त उद्वेग नहिं जो उद्वेग न जीव
अमर्ष, हर्ष, उद्वेग, भय मुक्त परम प्रिय भक्त।। 15।।

आकांक्षा से रहित जो शुचि दक्ष निरपेक्ष
दुःखहीन अक्रिय वही मुझको अति प्रिय भक्त ।। 16।।

राग द्वेष अरु शोक नहिं और नहीं हर्षात्
जिसने त्यागे शुभ अशुभ, भक्ति युक्त प्रिय भक्त ।। 17।।

जो सम रिपु अरु मित्र में और मान अपमान
सुख दुख अरु शीतोष्ण सम,आस रहित प्रिय भक्त।। 18।।

निन्दा स्तुति जान सम, येन केन संतुष्ट
मौनी घर से हीन जो, स्थिर धी प्रिय भक्त ।। 19।।

जो श्रद्धा से युक्त हों, मम परायण भक्त
धर्म अमृत इसको भजें, मुझको अति प्रिय भक्त।। 20।।
                                         



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