इन्द्रियाँ बलवान हैं, मन और भी बलवान है
बुद्धि है मन से बड़ी, और जीव है सबसे बड़ा।।
रजोगुण से जन्म है, काम क्रोध यह रूप
बहु भक्षी, बड़ पापि यह, इसको तू रिपु जान।।
तीसरा अध्याय-कर्मयोग
ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है,
यही
तुम्हें है मान्य
फिर हे केशव क्यों
मुझे, करवाते भय कर्म।। 1।।
केशव मिश्रत वचन से बुद्धि भ्रमित हो जाय
एक मार्ग निश्चित करें ,
कल्याणम्
पहुंचाय।। 2।।
दो प्रकार की निष्ठा जग मे,
पुरा
कही निष्पाप
सांख्यों का है ज्ञान योग,
योगी
निष्ठा कर्म।। 3 ।।
कर्म त्यागने मात्र से,
नहिं
होता है सिद्ध
आरम्भ बिना ही कर्म के,
नहिं
होता निष्काम।। 4।।
धर्म विरत क्षण मात्र भर,
रहे
न कोई काल
प्रकृति जनित गुण कर्म से,
पर
वश हुआ स्वभाव।। 5।।
मन मन भावे तन से रोके,
कर्मेंन्द्रिय
व्यापार
मिथ्याचारी मूढ़ बुद्धि वह,
मन
से कर व्यवहार।। 6।।
मन से वश कर इन्द्रियाँ,
अनासक्त
का योग
अति विशिष्ट जन सोई है,
जो
करता है योग।। 7।।
विधि सम्मत तू कर्म कर,
जान
कर्म को श्रेष्ठ
देह धर्म नहिं सिद्ध है,
बिना
कर्म हे पार्थ।। 8।।
यज्ञ कर्म को छोड़कर सब बांधें जंजाल
अनासक्त हो कर्म कर यज्ञार्पण कर दे सदा।। 9।।
कल्प आदि विधि ने रचा,
यज्ञ
सहित भू लोक
यज्ञ करें कल्याण को,
पूर्ण
कामना होय।। 10।।
उन्नत होंगे देवगण,
तुम
उन्नत हो जाव
प्रति उन्नत करते हुए,
परम
श्रेय को पाव।। 11।।
यज्ञ सम्मुन्नत देवगण,
देंगे
इच्छित भोग
भोगे अर्पित देव बिन,
निश्चय
ही वह चोर।। 12।।
बचे अन्न जो यज्ञ से,
सन्त
मुक्त परसाद
केवल भरते पेट जो,
पाप
भक्ष्य वे लोग।। 13।।
प्राणी उपजे अन्न से,
वर्षा
उपजे अन्न
होती वर्षा यज्ञ से,
यज्ञ
कर्म उत्पन्न।। 14।।
कर्म उपजे वेद से,
वेद
उपज पर ब्रह्म
ब्रह्म सर्वगत सर्वदा,
नित्य
यज्ञ स्थित स्वयं ।। 15।।
विधि सम्मत इस चक्र को,
नहि
वरते अनुकूल
वह विषयी पापायु नर,
व्यर्थ
जिये जग जान।। 16।।
आत्म रत अरु तृप्त है,
आत्मा
में संतुष्ट
नहीं कर्म अवशेष हैं,
सच्चे
परमानन्द।। 17।।
जिसका कुछ नहिं अर्थ है,
कर्म
और अकर्म
किचिन्मात्र न होता उसका,
भूत
स्वार्थ सम्बन्ध।। 18।।
अनासक्त का भाव रख,
कर्तव्य
कर्म कर पार्थ
अनासक्त जो कर्मरत रत,
परमात्मा
को प्राप्त।। 19।।
अनासक्त जनकादि थे,
परम
सिद्धि को प्राप्त
उसी भाव से कर्म कर,
यही
धर्म का मार्ग ।। 20।।
महानुभाव का आचरण,
दे
लोकन में सीख
करें अनुसरण लोग सब,
दे
जाते जो सीख।। 21।।
नहीं शेष कुछ कर्म मम,
तीन
लोक जग माँहि
तब भी हूँ मैं कर्मरत,
दुर्लभ
कुछ भी नाहिं।। 22।
सावधान नहिं कर्मरत,
सुना
पार्थ चित लाय
बरतेंगे तस लोग सब,
मार्ग
मोर वह जान।। 23।।
विरत कर्म से मैं रहूँ,
भ्रष्ट
लोक हो जांय
संकर बढ़े, प्रजा मरे,
हनन
दोष लग जाय।। 24।।
हे भारत,
आसक्त
जन, रहे कर्म में लीन
अनासक्त विद्वान जन,
करे
लोक में कर्म।। 25।।
आत्म ज्ञान से युक्त जो,
करे
कर्म तद्भाव
नहिं टारे आसक्त मति,
भ्रम
नहिं डारे बुद्धि।। 26।।
जानो गुण तुम प्रकृति के,
सब
कर्मन का मूल
होकर मोहित अहम् से,
मैं
कर्ता हठ मान।। 27।।
गुण ही गुण के गुण रहे,
गुण
कर्मों को जान
पड़ा भाव आसक्ति का,
जान
तत्व का ज्ञान।। 28।।
हों मोहित गुण प्रकृति से,
धरें
कर्म विश्वास
विज्ञ न विचलित मूढ़ को,
तोड़
न उनकी आस।। 29।।
अर्पित कर सब कर्म मम, चित्त लगा परमात्म
आस मोह तजि, दुःख ज्वर,
पार्थ
युद्ध की ठान।। 30।।
द्वेष बुद्धि से रहित हो,
श्रद्धा
से हो युक्त
कटे कर्म बन्धन सभी,
जो
माने उपदेश।। 31।।
जो नहिं विचरें एहि मत,
दोष
देखिये मोर
मोहित चित सब ज्ञान से,
करें
आपना नाश।। 32।।
प्रकृति प्राप्त होते सभी,
ज्ञानी
का यह भाव
क्या कर सकता हठ यहाँ,
परवश
हुआ स्वभाव।। 33।।
राग द्वेष से युक्त हैं,
इन्द्रिय
इन्द्रिय तत्व
महाशत्रु कल्याण के,
नहिं
वश इनके होय ।। 34।।
गुण रहित निज धर्म भी,
महत
जान पर धर्म
मरण भला निज धर्म में,
अपर
धर्म भय जान।। 35।।
कहो कृष्ण,
यह
जीव क्यों, करे अनिच्छित पाप
जबरन यह दुष्कर्म रत,
कहाँ
से प्रेरित आप।। 36।।
रजोगुण से जन्म है,
काम
क्रोध यह रूप
बहु भक्षी, बड़ पापि यह,
इसको
तू रिपु जान।। 37।।
मल से दर्पण है ढका,
अग्नि
धुएं से जान
गर्भ ढका ज्यों जेर से,
ज्ञान
काम से जान।। 38।।
काम महारिपु ज्ञानि का,
घेरा
जिसने ज्ञान
पावक सम यह काम है,
कभी
नहीं संतुष्ट।। 39।।
इन्द्रिय मन अरु बुद्धि हैं,
सदा
काम के वास
इनके द्वारा ढके ज्ञान को,
करे
जीव का नाश।। 40।।
नष्ट ज्ञान विज्ञान को,
करता
पापी काम
करके वश में इन्द्रियाँ,
बल
से इसको मार।। 41।।
इन्द्रियाँ बलवान हैं,
मन
और भी बलवान है
बुद्धि है मन से बड़ी,
और
जीव है सबसे बड़ा।। 42।।
बुद्धि से बढ़कर है जो,
अति
श्रेष्ठ है यह आत्मा
बुद्धि से कर वश मना ,प्रबल काम रिपु जीत ले ।। 43।।.
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