Wednesday, October 5, 2011

गीता - वसंतेश्वरी -Vasanteshwari -छठा अध्याय-आत्मसंयमयोग - रचनाकार - प्रो बसन्त


              कर स्वयं से उद्धार अपनाआप को तू ना गिरा
              आप अपना मित्र हैआप अपना शत्रु  है ।।

         छठा अध्याय-आत्मसंयमयोग


तजे अग्नि, नहिं अक्रिय, नहिं योगी सन्यासी
तज आश्रय सब कर्म फल, कार्य कर्म स्वीकार।। 1।।

वही योग है पार्थ सुन, कहलाता सन्यास
संकल्पों में लिप्त जन, योगी कभी न जान।। 2।।

चढ़ना चाहे योग मुनि, कर्म हेतु तू जान
योग चढ़े मुनि के लिए, शम है कारण जान।। 3।।

इन्द्रिय भोग न कर्म में , अनासक्त जेहि काल
सर्व संकल्प सन्यासी, योगारूढ़ कहात।। 4।।

कर स्वयं से उद्धार अपना, आप को तू ना गिरा
आप अपना मित्र है, आप अपना शत्रु  है।। 5।।

मन इन्द्रिय विजयी हुआ, आत्म उसी का मीत
देही जो ना जीतता, स्वयं उसी का शत्रु ।। 6।।

सरदी गरमी, सुख-दुख, मान और अपमान
मन जीता चित शान्त हो, परमात्मा वह जान।। 7।।

इन्द्री जय कूटस्थ जो, ज्ञान विज्ञान से संतृप्त
माटी पत्थर स्वर्ग सम, युक्त योग सो जान ।। 8।।

सुहृद, मित्र, मध्यस्थ, रिपु, बन्धु, द्वेष्य, निर्दोष
साधु और असाधु में, सम बुद्धि अतिश्रेष्ठ।। 9।।



आशा रहित, संग्रह रहित योगी जो वश चित्त
एकाकी स्थित हुआ, आत्म निरन्तर चित्त।। 10।।

कुश मृगछाला वस्त्र को, शुद्ध भूमि में राखि
अति नीचा ना ऊँच में, आसन स्थिर थापि।। 11।।

क्रिया चित्त इन्द्रिय वशी , मन थिर आसन बैठ
अन्तःकरण की शुद्धि  को, करे योग अभ्यास ।। 12।।

काया ग्रीवा शीश को, थिर सम कर थिर होय
दृष्टि अग्र में नासिका, दिशा ज्ञान नहि होय।। 13।।

ब्रह्मचारी, भय रहित, युक्त सदा मन शान्त
स्थित निज चित मोर में तत्पर वह मेरे सदा।। 14।।

वश में जिसका चित्त है, स्वयं आत्म थिर जान
परम शान्ति निर्वाण को, योग सिद्ध है प्राप्त।। 15।।

जो भोजन बहु खात है, अरु भोजन नहिं खात
निद्रा जाग्रति बहु अधिक, होय सिद्ध नहिं योग।। 16।।

युक्ताहार विहार है युक्त चेष्टा कर्म
उचित जागरण बोध है, योग प्राप्ति दुःख हानि।। 17।।

वशी  चित्त जेहि काल में, स्थित हो निज आत्म
भोग रहित, स्पृहा रहित, योग युक्त तेहि काल।। 18।।

चंचल होता दीप नहिं, जहाँ वायु गतिहीन
ऐसी उपमा सो यती, आत्म स्थिर जेहि चित्त।। 19।।

निरुद्ध चित्त उपराम हो, जेहि काल योगाभ्यास
सूक्ष्म धी से देख आत्म , आत्म में संतुष्ट हो।। 20।।

इन्द्रिय परे जो परम सुख है, शुद्ध बुद्धि जानता
प्राप्त कर योगी अवस्था, तत्व से विचलित नहीं।। 21।।

प्राप्त कर जिस लाभ को, अपर उससे नहिं अधिक
प्राप्त कर योगी अवस्था,भारी दुख विचलित नहीं।। 22।।

संयोग वियोग दुःख है नहीं, जान उसको योग
विचलित जाका चित्त नहिं, साधे तब वह योग।। 23।।

संकल्प जन्मी कामना को, पूर्णता से त्याग कर
मन द्वारा निग्रह करे, सब इन्द्रिय सब ओर।। 24।।

क्रम से कर अभ्यास को, उपरति को हो प्राप्त
धृति धी से मन आत्म में, सब चिन्तन को त्याग।। 25।।

चंचल मन स्थिर नहीं, डोलत विषय बाजार
रोक सभी विषयन इसे, कर निरुद्ध निज आत्म।। 26।।

जिसका मन प्रशान्त है, जिसका रज है शान्त
पाप रहित ब्रह्म भूत वह, उत्तम  सुख को प्राप्त ।। 27।।

सदा ब्रह्म रत आत्मा, वह योगी निष्पाप
अति सुख अनुभव सो करे, ब्रह्म प्राप्ति आनन्द।। 28।।

सम दृष्टी सब में सदा, योग युक्त है आत्म
लख भूतों में आत्मा, आत्मा में सब भूत।। 29।।

मुझको देखे सब जगह, सब जग मुझ में देख
ताहि अदृश्य न मैं रहूँ, वह नहिं मुझे अदृश्य।। 30।।

सब भूतन स्थित मुझे, भजे जो एकीभाव
सब प्रकार वर्तमान वह, योगी वरते पार्थ।। 31

निज समान सम देखता, सब भूतन में पार्थ
सुख दुख को सम देखता, वह योगी अति श्रेष्ठ।। 32।।

समत्व भाव योग यह, मधुसूदन मुझसे कहा
वह स्थिर स्थित नहीं, मन चंचल बलवान।। 33।।

मन अति चंचल कृष्ण है, द्रढ़ प्रमथन बलवान
वायु सम दुष्कर कठिन, इसका निग्रह जान।। 34।।

निःसन्देह निग्रह कठिन, मन चंचल बलवान
अभ्यास और वैराग्य से, पार्थ होय वश जान।। 35।।

जिसका मन वश में नहीं, उसे सुलभ नहिं योग
सहज सुलभ मन वश किया,यत्न पुरूष को होय।। 36।।

श्रद्धा है संयम नही, चित विचलित हो योग
योग सिद्धि नहिं प्राप्त कर,कृष्ण कौन गति होय।। 37।।

छिन्न भिन्न आश्रय रहित, ज्यों बादल हो नष्ट
मोहित चित आश्रय रहित, योग भ्रष्ट हो नष्ट।। 38।।

करो नष्ट संशय मम,  कृष्ण तुम्हीं इस योग्य
नहिं कोऊ संसार में, कर संशय को नष्ट ।। 39।।

ऐसे जन का नाश नहिं, इह लोक परलोक
करे कर्म कल्याण का, पार्थ न दुर्गति होत।। 40।।

योग भ्रष्ट बहु काल तक, शुभ   लोकन कर वास
लेते जन्म अति शुचिन के, अरु लक्ष्मी घर वास।। 41।।

अथवा जनमत ज्ञानि के, अरु योगी संसार
निसंदेह दुर्लभ परम, अस जन्म संसार।। 42।।

पूर्व देह संग्रह किया, पाता धी संयोग
सोइ पार्थ प्रभाव से, करे सिद्धि का योग।। 43।।

पूर्व देह के ज्ञान से, अवशी  भी आकृष्ट
अस जिज्ञासु योगी तजे, वेद आस सब कर्म।। 44।।

पूर्व जन्म फल से करे, यत्न सहित अभ्यास
सकल पाप से रहित हो, योगी ब्रह्म में वास।। 45।।

योगी तापस से अधिक, योगी ज्ञानी श्रेष्ठ
योगी श्रेष्ठ सकाम नर, योगी तू हो पार्थ ।। 46।।

मम अनुरागे चित्त से, भजे मोहि दिनरात
योगी श्रद्धावान वह, परम श्रेष्ठ है मान्य। 47।।


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