Thursday, October 6, 2011

गीता -वसंतेश्वरी -Vasanteshwari-आठवाँअध्याय-अक्षरब्रह्मयोग-रचनाकार बसन्त


                   अन्तकाल जिस भाव सेकरें देह का त्याग
                भावति भाव सदा वहीउसी भाव को प्राप्त।। 
  

      आठवाँअध्याय-अक्षरब्रह्मयोग  
      
ब्रह्म क्या, अध्यात्म क्या, कर्म क्या पुरुषोत्तम
 कहते किसे अधिभूत हैं, अधिदेव किसको जानते।। 1।।

कौन यहाँ अधियज्ञ है, कैसे बैठा देह
अन्त समय प्रभु किस तरह, युक्त चित्त हो ज्ञेय।। 2।।

नाश रहित परब्रह्म है, स्वभाव अध्यात्म ज्ञान
भाव हो भूतों का जिससे, विसर्ग कर्म है जान।। 3।।

नाशवान अधिभूत हैं, पुरूष दैव अधि जान
जान  देह  अधियज्ञ मैं, पार्थ तत्त्व तू जान।। 4।।

अन्त काल इस देह को, मम सुमिरन कर त्याग
इसमें संशय है नहीं, मम स्वरूप को प्राप्त।। 5।।

अन्तकाल जिस भाव से, करें देह का त्याग
भावति भाव सदा वही, उसी भाव को प्राप्त।। 6।।

प्रतिपल भज मुझको सदा और युद्ध रत होय
मम अर्पित मन बुद्धि से प्राप्त मुझे तू होय।। 7।।

पार्थ, निरन्तर दत्त चित्त, करे  योग अभ्यास
पुरुषोत्तम को प्राप्त नर, परम दिव्य प्रकाश।। 8।।

भज सर्वज्ञ अनादि को, अणु से अणु रवि तेज
शासक, धाता अचिन्त्य जो, तमस परे शुचि  रूप।। 9।।

अन्तकाल वह योग बल, प्राण भृकुटि कर थाप
निश्चल मन भज दिव्य को,परम पुरुष को प्राप्त।। 10।।

जिसे वेद विद अक्षर कहें, राग वीत जहँ जात
ब्रह्मचर्य जिसके लिए, सुन लघु में वह पाद।। 11।।

सब द्वारों को रोककर, मन को हृदि में थाप
प्राणधार मस्तक परम आत्मयोग स्थाय।। 12।।
ओंकार पर ब्रह्म है, व्यवहार मम चिन्तन करे
अन्तकाल तजि देह वह, परमगती को पाय।। 13।।

अनन्य चित्त से युक्त हो, भजे सदा मम नाम
सहज सदा हूँ मैं सुलभ, नित्ययुक्त सो योगी ।। 14।।

परम सिद्धि को प्राप्त जन, पाते मेरा धाम
पुनर्जन्म बन्धन कटे, दुख से हो विश्राम ।। 15।।

ब्रह्म लोक पर्यन्त तक पुनरावर्ती लोक
पार्थ प्राप्त होकर मुझे पुनर्जन्म विश्राम।। 16।।

रात्रि दिवस ब्रह्मा रचा सहस चतुर युग काल
जो जानत इस तत्व को, जान काल का हाल।। 17।।

सभी व्यक्त अव्यक्त से, प्रकट दिवस आरम्भ
रात्रि विलय होते पुनः, सूक्ष्म देह परब्रह्म ।। 18।।

सभी भूत उत्पन्न हों, आरम्भ रात्रि में लीन
दिन प्रवेश उत्पन्न फिर, वशी  प्रकृति सुन पार्थ ।। 19।।

अपर भाव अव्यक्त से, अव्यक्त सनातन भाव
सकल भूत के नाश पर, उसका होत न नाश ।। 20।।

अव्यक्त अक्षर है कहा, परमगती वह जान
जिसे पाय लौटे नहीं, परम है मेरा धाम।। 21।।

जिसके भीतर भूत हैं, जग जिससे परिपूर्ण
एक भक्ति से लब्ध वो, परम पुराण पुरुष।। 22।।

अनावृत्ति, आवृत्ति को, योगी करते प्राप्त
देह त्याग जिस काल में, पार्थ जान तू काल।। 23।।

ज्योति, अगिन, अहः, शुक्ल, षड मास उत्तर अयन के
प्राप्त ब्रह्म को ऐहि विधि, विज्ञ ब्रह्म हे पार्थ।। 24।।

धूम, रात्रि तथा कृष्ण  षड मास दक्षिण अयन के
ज्योति चन्द्र की प्राप्त कर आवृत्ति को हो प्राप्त।। 25।।

होय जगत में आदि से, शुक्ल-कृष्ण गति ज्ञात
एक गये आवृत्ति हो, अन्य अनावृत्ति जान।। 26।।

तत्व जान इस मार्ग का, योगी मोह न होय
सम धी अर्जुन काल सब, योग युक्त तू होय।। 27।।

वेद, यज्ञ, तप, दान के, पुण्य अल्प हैं पार्थ
जान तत्व योगी पुरुष, परमधाम को प्राप्त।। 28।।


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