आदि देव तू परम पुरुष तू परमाश्रय भी तू
ज्ञाता भी तू ज्ञेय भी तू है तू अनन्त स्वरूप
जगत पूर्ण परिपूर्ण तुम्ही से परम धाम भी तू।।
ग्यारहवाँ अध्याय-विश्वरूपदर्शन योग
परम गूढ़ अध्यात्म वचन,
कहा
कृपा करि आप
नष्ट हुआ अज्ञान मम,
जान
तत्व हे नाथ।। 1।।
कमल नयन तुमसे सुना अविनाशी का ज्ञान
सकल भूत का जन्म लय,
मम
जाना विस्तार।। 2।।
जैसा कहते स्वयं को,
हे
परमेश्वर आप
मैं देखन चाहूँ पुरुष,
ऐश्वर्य
रूप विस्तार।। 3।।
जानते हैं शक्य मेरा,
दिव्य
दर्शन आपका
योगेश्वर दर्शाइये,
निज
अविनाशी रूप।। 4।।
शतत् हजारों रूप मम,
देख
पार्थ इह काल
बहु प्रकार बहु वर्ण के,
दिव्य
अलौकिक रूप।। 5।।
देख सभी,
आदित्य
को, वसू रुद्र को देख
आश्विन मरुत आश्चर्य पुनि,
अनदेखे
मम रूप।। 6।।
देख जगत सम्पूर्ण में,
जो
चाहे सो देख
पार्थ एकस्थ मम देह में,
सभी
चराचर देख ।। 7 ।।
देख सके मुझको नहीं निज नेत्रों से
पार्थ
दिव्य चक्षु देता तुझे देख योग ऐश्वर्य।। 8 ।।
तब श्री योगेश्वर हरि ने,
यह
कहकर हे राजन
दिखलाया प्रिय पार्थ
को, दिव्य अलौकिक रूप।। 9।।
अनेक मुख नेत्र से,
अनेक
रूप को लिए
धार दिव्य भूषणादि,
दिव्य
शस्त्र हाथ में।। 10 ।।
धार दिव्य माल वस्त्र,
दिव्य
गन्ध लेप किये
आश्चर्य सभी से युक्त जो,
अनन्त
हे विराट देव।। 11।।
उदित सहस्त्रों सूर्य दिवि,
उनसे
प्रगटे तेज
तेज सदृश वह परम सम नहीं कदाचित होय।। 12।।
खंड खंड बहु विधि जगत,
पार्थ
दृष्ट तेहि काल
एक जगह स्थित जगत,
देव
देव की देह।। 13।।
तब विस्मय से चकित वह,
पुलक
गात कर बद्ध
सिर प्रणाम कर देव को,
यह
स्वर बोला पार्थ ।। 14।।
मैं देखूँ तव देह में सभी ऋषी अरु भूत
सकल देव, ब्रह्मा,
शिवा
दिव्य सर्प सब साथ।। 15।।
नाना मुख भुज उदर दृग,
रूप
अनन्त तव दृष्ट
आदि मध्य अरु
अन्त नहिं,हे विश्वेश्वर विश्व रूप।। 16।।
दृष्ट चक्र गदा मुकुट तेज पुंज दीप्तमान
ज्वलित अग्नि सूर्य
ज्योति,दृष्टि कठिन अप्रमेय रूप।। 17।।
ज्ञान ज्ञेय परम अक्षर,
परम
धाम हे प्रभो
रक्ष शाश्वत धर्म के,
नाश
रहित अनादि हो।। 18।।
आदि अन्त अरु मध्य नहिं अनन्त वीर्य
भगवान
बहुत बाहु शशि सूर्य नयन दीप्त अग्नि
मुख रूप
तप्त करत निज तेज से,
सकल
जगत को ईश।। 19।।
स्वर्ग धरा आकाश दिश,
सकल
पूर्ण एक आप
देख रूप उग्र दिव्य, तीन लोक भय व्याप्त।। 20 ।।
करें प्रवेश सुर संघ तुम,
कुछ
जोड़े भय हाथ
स्तुति करें स्त्रोत बहु महर्षि सिद्ध
समुदाय
उच्चारण तब नाम का,
कहें
होय कल्याण।। 21।।
आदि रुद्र वसु मरुतगण साध्य सकल समुदाय
विश्व देव अरु अश्विनो,
सिद्धों
का समुदाय
यक्ष रक्ष गन्धर्व सब देख रहे आश्चर्य ।। 22।
बहुत नेत्र बहु जङ्घ मुख,
बहुत
बाहु बहु पेट
दंत काल विकराल से बड़ा भयंकर रूप
देख लोक भय व्याप्त हैं,
मैं
भी भय से व्याप्त।। 23।।
फैलाये मुख को लिए,
छूते
तुम आकाश
दीप्त तुम्हारा रूप यह,
बहुत
वर्ण से व्याप्त
दीप्त विशाल नयन हरि,
देख
तुम्हारा रूप
व्यथित आत्म धीरज नहीं,
नहीं
शान्ति को प्राप्त।। 24।
दाढ़ विकराल हैं प्रलय काल अग्नि सम
जान नहिं दिशा आदि,
आनन
को देख के
सुख नहिं पाता ईश,
हो
प्रसीद नाथ तुम
हे जगत के स्वामी,
हे
जगत के ईश ।। 25।।
सभी पुत्र धृतराष्ट्र के और सभी नरपाल
भीष्म द्रोण अरु कर्ण भी और रथी मम पक्ष।। 26।।
बड़े वेग से दौड़कर,
विकराल
दाढ़ मुख पैठ
अन्य चूर्ण सिर से हुए,
दंत
मध्य अस दृश्य ।। 27।।
जैसे नदियां बहुत जल,
धावति
जलनिधि पास
तैसे धावत ज्वलित मुख,
वीर
ऐहि संसार।। 28।।
धावत वेग प्रवेष कर ज्वलित अग्नि में नाश
तैसे लोग पतंग सम,
करें
वेग तव दाढ़।। 29।।
ज्वलित वदन से ग्रास कर चाट रहे सब ओर
विष्णु पूर्ण कर जगत को तप्त तेज तव रूप।। 30 ।।
उग्र रूप तुम कौन हो,
बतलायें
प्रभु आप
देव श्रेष्ठ तुमको नमन,
हो
प्रसीद प्रसीद
आदि पुरुष को आप हैं,
तत्व
ज्ञान मैं आस
नहिं जानत तव प्रवृत्ति को,
कहा पार्थ यदुनाथ।। 31।।
लोक नाश को प्रकट हूँ फैला काल कराल
रणी सकल प्रतिपक्ष में नष्ट तोर बिन पार्थ।। 32।
उठ जीत शत्रु यश प्राप्त कर,
भोग
राज्य समृद्धि
पहले ही मैंने हते,
निमित्त
मात्र हो पार्थ।। 33।।
द्रोण,
भीष्म,
कर्ण
जयद्रथ और अन्य बहु वीर
भय मत कर जय युद्ध में,
हते
हुए को मार।। 34।।
केशव के इस वचन को,
हाथ
जोड़ सुन पार्थ
कंपित नमस सभीत अति,
कर
प्रणाम श्री कृष्ण
गदगद वाणी से कहा,
सुनो
जगत के नाथ।। 35।
जग हरषे तव नाम गुण और प्राप्त हो प्रीत
रक्ष भाग सब ओर को,
हृषीकेश
यह योग्य
सिद्ध संघ सब मिलकर कहें,
नमः
नमः श्री कृष्ण।। 36।।
ब्रह्मा के तुम हो पिता और बड़े सब देव
सत् असत् पर अक्षर तुम्ही,
क्यों
न नवायें शीश
हे देवश हे जगन्निवास,
हे
महात्मन नमः नमः।। 37।।
आदि देव तू परम पुरूष तू परमाश्रय भी तू
ज्ञाता भी तू ज्ञेय भी तू है तू अनन्त
स्वरूप
जगत पूर्ण परिपूर्ण तुम्ही से परम धाम भी तू।। 38।।
धर्मराज तू वरूण देव तू अग्नि चन्द्र भी
तू
प्रजापती तू ब्रह्म पिता तू नमन हजारों
बार
नमः नमः हे, नमः नमः हे नमः नमः भगवान।। 39।।
नमः अग्र से नमः पृष्ठ से नमः सर्व चहुँ
ओर
सर्वआत्म तू अनन्त वीर्य तू व्याप्त सकल
भगवान
सर्वरूप हे नमः नमः हे नमः नमः भगवान ।। 40।।
सखा कहा यादव कहा,
कहा
कृष्ण अज्ञान
तव प्रभाव जाना नहीं हुआ मोह अपराध
नहीं सोचे समझे कहा और कहा हठधर्म
और प्रेम से कह सखा अच्युत तुमको मित्र।। 41।।
सखा जान सम्मुख कहा और कहा एकांत
भोजन शयन विनोद में कृष्ण कहा भगवान
और कहा यादव तुम्हें आसन और विहार
अपमानित अज्ञान से क्षमा करो अपराध।। 42।।
पिता चराचर जगत के,
गुरु
गुरु अति से पूज्य
अमित प्रभाव त्रिलोक में,
सम
नहीं अन्य न श्रेष्ठ।। 43।।
देह चरण में राखि के,
कर
प्रणाम हे ईश
तुम वन्दन के योग्य हो,
प्रभु
प्रसीद प्रसीद
मित्र मित्र सुत के पिता क्षमा करे अपराध
जैसे प्रिय अपनी प्रिया,
सहन
करो अपराध।। 44।।
जो नहिं देखा पूर्व में,
देखि
रूप मैं हर्ष
पर व्याकुल है मोर मन,
देव
रूप दर्शाय
हो प्रसन्न हे जगन्निवास हे देवों के ईश।। 45।।
हाथ लिए गदा चक्र मकुट धरे शीश पर
चार भुजा युक्त दृष्ट,
विश्वरूप
सहस्त्र बाहु।। 46।।
अति प्रसन्न दर्शित तुझे,
आत्म
योग हे पार्थ
परम तेज मय आदि यह सीमा रहित विराट
पूर्व अन्य देखा नहीं तेजोमय यह रूप।। 47।।
नहीं रूप यह दृश्य है,
तव
समान नर लोक
वेद यज्ञ अध्ययन तप,
क्रिया
दान हे वीर।। 48।।
नहि व्यथा अरु मू़ढ़ता देख रूप विकराल
प्रीत युक्त हो भय रहित देख चतुर्भुज रूप।। 49।।
सौम्य रूप धारण किया दर्शाया,
श्री
कृष्ण
भीत पार्थ धीरज दिया वासुदेव भगवान।। 50।।
तव रूप नर हरि शान्त अति,
देख
चित स्थिर हुआ
प्राप्त हूँ अपनी प्रकृति को,
जगत पिता हे ईश।। 51।।
अति सुर्दशन रूप यह जो देखा तू पार्थ
मन राखे सुर लालसा देखन नर हरि रूप।। 52।।
नहीं रूप यह दृश्य है तव समान नर लोक
वेद यज्ञ तप दान से,
नर
हरि दिव्य स्वरूप।। 53।
किन्तु पार्थ अति सुगम है श्री नर हरि
का रूप
राखे भक्ति अनन्य जो तत्व ज्ञान से एक।। 54।।
करे समर्पित कर्म मम,
मम
परायण होय
आस रहित निर्वैर वह मुझको पाता भक्त ।। 55।।
.....................................
Well Done
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