तीन नरक के द्वार हैं, काम क्रोध अरु लोभ
आत्म नाश करते यही, त्याग इन्हें तू पार्थ।।
सोलहवाँ अध्याय-दैवासुरदर्शन योग
दो प्रकार के भूत जग,
दैव
असुर हे पार्थ
दैव प्रकृति वर्णन बहुत,
असुर
प्रकृति को जान।। 6।।
आसुर जन जाने नहीं,
प्रवृत्ति
निवृत्ति हे पार्थ
नहीं शौच, आचार है नहीं सत्य आधार।। 7।।
वे कहते यह जग सदा,
असत्
अनीश्वर अप्रतिष्ठ
जन्म परस्पर भोग से,
कारण
इसका काम।। 8।।
लिए सहारा दृष्टि यह,
नष्ट
आत्म मति मंद
क्रूर कर्म, अपकार रत,
जगत
नाश को जन्म।। 9।।
आस असंभव आसरे,
दम्भ
मान मद युक्त
असत ज्ञान धारण करें,
भ्रष्ट
आचरण पार्थ।। 10।
नाना चिन्ता आश्रिता प्रलय रात्रि तक
पार्थ
काम भोग रत नर सदा इतना ही सुख मान।। 11।।
काम क्रोध आधीन नर,
बंधे
आश के पाश
काम भोग के हेतु को,
संचय
धन अन्याय।। 12।।
आज मुझे यह सब मिला,
इस
आसा को प्राप्त
इतना धन मम प्राप्त है,
फिर
होगा यह पास।। 13।।
मैंने मारा शत्रु यह,
और
अपर भी हन्य
मैं ईश्वर भोगी सुखी,
परम
सिद्ध बलवान।। 14।।
मम सम दूजा कौन है,
धन
कुबेर बहु पूत
यज्ञ,
दान
अरु मोद करूंगा, मोहित है अज्ञान।। 15।।
चित्त भ्रमित बहु भांति से,
मोह
जाल आवृत्त
विषय भोग आसक्त अति,
घोर
नरक में जात।। 16।।
स्वयं श्रेष्ठ दर्पी पुरुष,
धन
मान मद युक्त
शास्त्र रहित पाखण्ड से,
करे
नाम का यज्ञ।। 17।।
दर्प कामना क्रोध बल और अहं मन माहि
निन्दा रत कर द्वेष मम,
स्वयं
अन्य बस देह।। 18।।
ऐसे द्वेषी नराधम,
क्रूर
अशुभ रत कर्म
बार बार मैं डालता,
अशुभ योनि में
पार्थ।।19।।
मुझे न पाते मूढ़ नर,
असुर
योनि बहु जन्म
फिर पाते अति नीच गति और नीच से नीच।। 20।।
तीन नरक के द्वार हैं,
काम
क्रोध अरु लोभ
आत्म नाश करते यही,
त्याग
इन्हें तू पार्थ।। 21।।
मुक्त पुरुष तम द्वार त्रय,
करे
आत्म कल्याण
वह पाता है परमगति और मुझी को प्राप्त।। 22।।
त्याग शास्त्र विधि जो चले,
निज
इच्छा अनुसार
नहीं सिद्ध को प्राप्त हो,
नहीं
परम गति प्राप्त।। 23।।
जान शास्त्र प्रमाण तू कार्य अकार्य
प्रभेद
विधि सम्मत जो कर्म हैं,
वही
कर्म हैं योग्य।। 24।।
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