ज्ञानी वरते भेद नहिं, द्विज विनयी विद्वान
धेनु स्वान गज जान सम, अरु पापी चंडाल।।
पांचवाँअध्याय-कर्मसन्यासयोग
कभी प्रशंसा कर्म की,
पुनः
कर्म सन्यास
भली भांति कल्याण मम,
करो
एक ही बात।। 1।।
परम कल्याण युक्त है,
कर्मयोग
सन्यास
साध्य सुगम है कर्म अति,
श्रेष्ठ
योग सन्यास।। 2।।
नहिं कोऊ से द्वेषरत,
जा
नहिं कछु है चाह
द्वन्द्व रहित योगी सन्यासी,
सरल
मुक्ति को प्राप्त।। 3।।
कर्म योग,
अरु
सांख्य में भेद करत हैं अज्ञ
साधक स्थित एक में,
प्राप्त
दोऊ का फल।। 4।।
सांख्य योगी प्राप्त करते,
कर्म
योगी भी परम
सांख्य को अरु योग को,
सम
देखे सो विज्ञ।। 5।।
कर्म योग के बिना,
कठिन
प्राप्ति सन्यास
मुनि योगी जो कर्म का,
शीघ्र
प्राप्त परब्रह्म।। 6।।
इन्द्रिय,
मन
विजयी पुरुष, जिसका चित्त विशुद्ध
सकल भूत की आत्मा,
निज
आत्मा समरूप
योग युक्त करता हुआ,
नहीं
बंधे वह कर्म ।। 7।।
मैं नहिं कर्ता कर्म का,
जान
तत्व का ज्ञान
दृष्य श्रवण स्पर्श गमन भक्षण स्वपन अरु श्वास।। 8।।
त्याग ग्रहण उन्मीषन निमिष सूंघ अरु श्वास
इन्द्रिय वर्ते निज अर्थ में,
रहे
हमेशा बोध ।। 9।।
करे कर्म को जो आस तज,
अर्पित
कर सब ब्रह्म
लिप्त न हो बहु पाप में,
ज्यों
जल में मकरंद।। 10।।
त्याग कर आसक्ति निज मन,
देह
धी अरु इन्द्रियाँ
योगी केवल कर्म रत,
करे
चित्त को शुद्ध ।। 11।।
कर्म फल को त्याग कर,
पाता
शान्ति विमुक्त
कर्म फल आसक्त नर,
कर्म
से बंधता स्वयं।। 12।।
नव द्वारी इस देह में,
मन
से त्यागे कर्म
वशी , न कर्ता और कराता,
थिर
स्थित आनन्द ।। 13।।
प्रभु नहिं रचें ,
वरते
प्रकृति, कर्तापन का भाव
यही नियम है कर्म का,
यही
कर्म फल संयोग।। 14।।
प्रभु नहिं लेते जीव के,
पुण्य
पाप मय कर्म
ज्ञान ढका अज्ञान से,
मोहित
हैं जड़ जन्तु।। 15।।
आत्म ज्ञान से मिट गया जिसका भी अज्ञान
आत्मा को उज्वल करे,
आदित्य
सृदश सो ज्ञान।। 16।।
मन धी निष्ठा अरु लगन,
जिसकी
है तद्रूप
पाप रहित हो ज्ञान से,
परमगती
को पाय।। 17।।
ज्ञानी वरते भेद नहिं,
द्विज
विनयी विद्वान
धेनु स्वान गज जान सम,
अरु
पापी चांडाल। 18।।
जिसका मन सम भाव है,
जीते
जीता सर्ग
ब्रह्म सदा निर्दोष सम,
पार्थ
ब्रह्म स्थित स्वयं।। 19।
प्रिय को पा हर्षित नहीं,
अप्रिय
न देते शोक
स्थिर मति संशय रहित,
ब्रह्म
स्थित ब्रह्मवित्।। 20।।
बाह्य विषय आसक्ति तजि,
ले
आत्मनि आनन्द
अक्षय सुख अनुभव करे,
योग
युक्त परब्रह्म।। 21।।
भासे सुख इन्द्रिय विषय,
उपजे
विषयेन्द्रिय संयोग
प्रज्ञ नहीं उनमें रमें,
जान
अनित्य दुःख देत।। 22।।
जीवित जारे देह में,
काम,
क्रोध,
को
ज्वार
वह योगी, वह है सुखी,
यही
सत्य है पार्थ।। 23।।
अन्तः राम अन्तः सुखी,
अन्तः
ज्योति जो पार्थ
नित्य ब्रह्म स्थित स्वयं,
साँख्य
शान्त को प्राप्त ।। 24।।
पाप नष्ट संशय निवृत्त,
सर्व
भूत रत माहि
जेहि जीता मन आपना,
शान्त
ब्रह्म को पात।। 25।।
काम क्रोध से मुक्त है जिसका आत्मा
ज्ञान
मन विजयी ज्ञानी लिए,
शान्त
ब्रह्म परिपूर्ण।। 26।।
बाह्य विषय तज बाह्य ही,
नेत्र
भृकुटि के मध्य
सम कर प्राण अपान को विचरे नासा पार्थ ।। 27।।
जीता मन अरु इन्द्रियाँ,
तजे
क्रोध भय काम
मोक्ष परायण ज्ञानी मुनि,
सदा
मुक्त निष्काम।। 28।।
सकल यज्ञ तप भोक्ता,
सब
लोकन का ईश
सकल भूत का परम प्रिय परम शान्ति का ईश।। 29।।
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