Monday, October 3, 2011

गीता - बसंतेश्वरी - BASANTESHWARI –दूसरा अध्याय-सांख्ययोग- प्रो बसन्त प्रभात जोशी


               क्रोध से सम्मोह होतासम्मोह मति भ्रम जन्म दे
               मति भ्रम करती नाश बुद्धि का,बुद्धि नाश विनाश है।।                   
  

               दूसरा अध्याय-सांख्ययोग


करुण दशा रोते हुए शोकाकुल अकुलान
अर्जुन के प्रति दयावश बोले श्री भगवान ।। 1।।

विषम समय में कैसे व्यापा, मोह तुझे किस हेतु से
श्रेष्ठ पुरुष आचरण नहीं है,देता स्वर्ग न कीर्ति यह।। 2।।

क्लैव्यता मत प्राप्त कर तू, यह नहीं तेरे लिए
त्याग कर दुर्बल हृदय को, उठ खड़ा संग्राम कर।। 3।।

द्रोण, भीष्म पूज्य हैं, हे कृष्ण वे मेरे लिए
युद्ध में कैसे उन्हीं पर, बाण संचालन करूं।। 4।।

भिक्षान्न उपयुक्त है, गुरूजन रहें सप्राण
रुधिर भोग मोहि ना रुचे, कर गुरूजन निष्प्राण।। 5।।

देखा धातृराष्ट्रों को, बोला हे भगवान
यह नहिं जानत युद्ध में, को है अति बलवान
यह भी मैं नहीं जानता को जीतेगा युद्ध
नहिं चाहूं इस देह को स्वजनों को ही मार ।। 6।।

धर्ममूढ़ कायर हुआ, पूछूं साधन विनय वत
शिष्य हूँ, हे ईश तव मैं, उपदेश श्रेय का दीजिये।। 7।।

निष्कंटक धन धान्य पद, आधिपत्य स्वर्ग अपार
इन्द्रिय व्याकुल शोक का, नहीं कोई उपचार।। 8।।

जिसने जीता नींद को, जिसने जीते शत्रु
बोला वह श्री कृष्ण से, नहीं करूंगा युद्ध।। 9।।

दोनों सेना मध्य में, लिए मन्द मुस्कान
शोक करते पार्थ से, बोले श्री भगवान ।। 10।।

पंडित जैसे वचन हैं, पर करता है शोक
प्राण रहित जिन प्राण हैं, नहिं करते हैं शोक।। 11।।

मैं तू राजा यह सभी, और न थे केहि काल
ऐसा भी निश्चित परम, हम होंगे सब काल।। 12।।

देही होता देह में बालक वृद्ध जवान
अपर देहि की प्राप्ति से, नहीं धीर को मोह।। 13।।
                                     
इन्द्रिय तत्व अनित्य हैं, उत्पत्ति और विनष्ट
सर्दी गर्मी सुख दुख, सहज करे स्वीकार ।। 14।।

अमृत तत्व पाता वही सुख दुख रहे समान
विषय न जेहि व्याकुल करे, अमृत तत्त्व को पात ।। 15।।

असत् की सत्ता नहीं सत् का नहीं अभाव
तत्व ज्ञानी जानता इनका विषय विचार ।। 16।।

अविनाशी तू जान उसे, व्याप्त सकल संसार
नष्ट न कोई कर सके, अविनाशी का ज्ञान।। 17

नाश रहित अप्रमेय जीव यह, नित्य रूप है स्थित
इसके देह सदा ही मरते, जान युद्ध कर भारत ।। 18।।

जो जाने यह मारता, इसको मरता जान
वे दोनों नहिं जानते, नहिं मरता नहिं मारता।। 19।।

ना जन्मे ना मरण हो जीव किसी भी काल
जन्म ले नहिं जन्म दे सदा सत्य हर काल

नित्य अजन्मा शाश्वत, परम पुराण पुरुष
पार्थ हन्य इस देह के नहीं हन्य यह जीव ।। 20।।

जो जाने यह आत्मा नाश रहित अरु नित्य
अव्यय अज यह आत्मा, कैसे हने शरीर ।। 21।।

धारत है नव वस्त्र को, फटे पुराने त्याग
वैसे ही यह आत्मा, बदले अपनी देह।। 22।।

शस्त्र  न छेदन कर सके, पावक नहीं जलाय
पानी इसे गला न सके, वायु नहीं सुखाय।। 23।।

सर्वव्यापी अचल स्थिर, है सनातन आत्मा
यह अदाह्य अच्छेद्य है, अक्लेद्य अषोष्य लक्षणम्।। 24।।

अव्यक्त है, अचिन्त्य है, विकार हीन आत्मा
जानकर गुणों को इसके, शोक योग्य है नहीं ।। 25।।

मानता यदि जन्मना, मरण धर्मा मानता
जान इसकी नित्य गति, शोक तेरे योग्य नहिं ।। 26।।

जन्म लिया तो मरण है, मरण हुआ तो जन्म
अपरिहार्य यह क्रम सदा, नहीं शोक के योग्य।। 27।।

पूर्व में अव्यक्त थे, जो जन्म के अरु मृत्यु के
मध्य में जो प्रकट होते, शोक फिर किसके लिए।। 28।।

अचरज से देखे इसे अपर सुने आश्चर्य
अचरज से कहता इसे, श्रवण न जाने कोय।। 29।।

अवध्य होता देह में जो, प्राणियों के नित सदा
जानकर इसको विलक्षण, शोक तज दे तू सदा।। 30।।

देख के निज धर्म को, भय तुझे करना नहीं
धर्म युद्ध से श्रेयकर, कुछ अन्य कर्म नहीं यहाँ ।। 31।।

भाग्यवान ही वीर पाते, इस सृदश के युद्ध को
स्वर्ग का यह द्वार  है, स्वयं प्राप्त यह कर्म है।। 32।।

यदि होएगा युद्ध विरत, धर्म युद्ध से आप
धर्म कीर्ति का नाश कर, लग जाएगा पाप।। 33।।

मरने से ज्यादा बुरा, यदि अपयश लग जाय
बहुत काल गाथा रहे, मरण बुरो दुख होय।। 34।।

माननीय से तुच्छ बनेगा, है अर्जुन तू सोच
भय से भागा युद्ध में, माने तेरे लोग।। 35।।

निन्दा तब सामर्थ की, वैरी नहीं अघाय
अत्याधिक दुख पायेगा, सुन अबोल तू बोल।। 36

मरकर मिलना स्वर्ग है, जिते धरा के भोग
निश्चय कर उतिष्ठ हो, यह अति शुभ   संयोग।। 37।।

हानि लाभ अरु जया जय, सुख दुख को सम जान
पाप नहीं तू पायेगा, मन में रण की ठान।। 38।।

यह था दर्शन  सांख्य का, जिसमें बुद्धि का योग
अब सुन तू उस योग को, छूटे बन्धन कर्म।। 39।।

बीज तत्व न विनसता, ना फल दोष समाय
जन्म मृत्यु यह भय हरेकर्म योग उपाय।। 40।।

इस कल्याणी मार्ग में, व्यवसायी धी एक
अव्यवसायी धी बहुत हैं, इनमें भेद अनेक।। 41।।

अविवेकी भासित करे, कृत्रिम वाणी पार्थ
वेद वाद में रम रहे, नहीं अन्य कोई वस्तु ।। 42।।
परम स्वर्ग है, भोग रत, जन्म कर्म फल प्राप्त
भोग ऐश्वर्य प्राप्ति का नाना विधि विस्तार।। 43।।
जिनका चित चंचल हुआ, भोग ऐश्वर्य आसक्त
और परम में निश्चित धी का, होता सदा अभाव।। 44।।

त्रिगुण विषय वेद तजि, द्वन्द्व रहित हो आत्मवान
निर्योग क्षेम स्वीकार कर, परम सत्य चित आप ।। 45।।

ताल तलैया लघु अर्थ हों, पाकर सिन्धु अपार
पाकर बोध पर ब्रह्म का, वेद बूँद हो जाय।। 46।।

कर्म में अधिकार होवे, फल की इच्छा छोड़ दे
कर्म फल का हेतु मत बन, अनासक्त अकर्म में।। 47।।

आसक्ति को तू त्याग कर, सम बुद्धि सिद्धि असिद्धि में
योग स्थित कर्म कर तू, समत्व नाम योग है।। 48।।

बुद्धि योग अति श्रेष्ठ है, अवर है सकाम
जान सकामी दीन अति, शरणांगत सम बुद्धि।। 49।।

बुद्धियोगी त्याग देता, शुभ अशुभ सब कर्म को
बुद्धि योग ही राह है, कर्म कौशल की यहाँ।। 50।।

विज्ञ, बुद्धि से फल को त्यागे, जन्म लें जो कर्म से
निर्विकार परम पद पावे, जन्म बन्ध विमुक्त हो।। 51।।

मोह के सागर से यह, बुद्धि जब तर जायेगी
सुन के जाना जिनको तूने, भोग वैराग्य पायेगा।। 52।।

श्रुति प्रतिपादित ज्ञान से, तब धी स्थिर होय
अचल समाधि को प्राप्त कर, योग पुरुष तू होय।। 53।।

समाधि स्थित प्रज्ञ के, लक्षण क्या हैं कृष्ण
कैसे चलता बोलता, बैठे स्थिर बुद्धि।। 54।।              
                  
त्यागे मन की कामना, सकल पार्थ जेहि काल
आत्म संतुष्ट आत्म में, स्थित प्रज्ञ कहात।। 55।।

दुख में मन उद्विग्न नहिं, सुख में नहीं है राग
राग क्रोध भय मुक्त जो, स्थित प्रज्ञ है पार्थ ।। 56।।

स्थिर उसकी बुद्धि है, उदासीन रह जाय
शुभ   और अशुभ   पाय के, हर्ष न द्वेष समाय।। 57।।

अंगो को समेटता, कश्यप चारों ओर
ऐसे ही सब इन्द्रियाँ, सिकुड़े स्थिर बुद्धि ।। 58

निराहारी देही भी होता विषय निवृत्त
रस नहिं होत निवृत्त देहि का, परम बोध जब होत नहिं।। 59।।

रस का नाश न होता जिसका, यत्नशील धियवान
चंचल उसकी इन्द्रियाँ, मन हरती बलवान।। 60।।

वश में करके इन्द्रियाँ, मम पारायण होय
जो राखे वश इन्द्रियाँ, धी थिर वाकी होय।। 61।।

विषयों का चिन्तन करे, तदाकार हो जाय
संग जन्म दे काम को, काम क्रोध संचार।। 62।।

क्रोध से सम्मोह होता, सम्मोह मति भ्रम जन्म दे
मति भ्रम करती नाश बुद्धि का,बुद्धि नाश विनाश है।। 63।।


जिस साधक के वश में मन है, जिसके वश में इन्द्रियाँ
राग द्वेष से मुक्त वह,भोग विचरता परम शान्ति से ।। 64।।

निर्मल चित दुख दूर हों, ना कुछ रहे अभाव
ऐसे धीर प्रसन्न की, बुद्धि अचल हो जाय ।। 65।।

भाव हीन को शान्ति नहिं, शान्ति रहित सुख नाहिं
प्रज्ञा नहिं अयुक्त में, आस्था भाव भी नाहिं।। 66।।

विषय विचरती इन्द्रियाँ, जब मन उनके साथ
इन्द्रिय हरण  करें प्रज्ञा का, वायु नाव जल में हरे।। 67।।

जिसने जीती इन्द्रियाँ, कर वश में सब विषय रस
प्रज्ञा उसकी स्थिर रहती, हे विशाल भुज दंड के।। 68।।

जब सोये संसार सब, संयम योगी जाग
जब जागे संसार सब, तब सो मुनिवर सोय।। 69।।

नदी नदों से भरता हुआ भी,
समुद्र ज्यों है स्थित प्रतिष्ठित
त्यों काम सारे जिसमें समाये,
पाता वही शान्ति न काम कामी।। 70।।

तृष्णा त्यागी सकल जिन, करें मोह का नाश
अंहकार स्पृह रहित, पाता शान्ति का साथ।। 71।।

स्थित हुवा ब्रह्म में, मोहित कभी न होय
अतं काल स्थित  हुआ, पाता परमानन्द ।। 72।।


          
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