Thursday, October 6, 2011

गीता-बसन्तेश्वरी-vasanteshwari - नौवाँअध्याय- राजयोग -रचनाकार प्रो बसन्त


           अनन्य भाव भज मोहि कोदूराचारी अति पार्थ
           साधु जान निश्चय उसेनिश्चय उसे यथार्थ ।। 

              नौवाँअध्याय-राजयोग


परम गुहय विज्ञान मय, ज्ञान जान निर्दोष
जान जिसे तू मुक्त हो, दुख रूपी संसार।। 1।।

नाश रहित, उत्तम , पवित्र साध्य सुगम यह ज्ञान
धर्म युक्त प्रत्यक्ष फल, राज ज्ञान अतिगुहय।। 2।।

जो नर श्रद्धाहीन है, हे अर्जुन इस धर्म
मैं अप्राप्त विचरें सदा, जन्म मृत्यु संसार।। 3।।

जगत समाया अव्यक्त में, स्थित मम सब भूत
अचरज यह तू जान ले, नहिं स्थित मैं भूत।। 4।।

भूत न स्थित मोहि में, देख योग ऐश्वर्य
भूत भावन मम आत्मा, नहिं स्थित है भूत।। 5।।

सर्वत्र विचरता वायु ज्यों, है स्थित आकाश
वैसे ही सब भूत हैं, मम स्थित तू जान।। 6।।

सकल भूत कल्पान्त में, लीन प्रकृति मम जान
कल्प आदि में पुनः, मैं रचता, हे पार्थ।। 7।।

भूत प्रकृति बल अवश हो, रचता बारम्बार
मैं निज प्रकृति स्वीकार कर, भूत रचे संसार।। 8।।

कर्म करूं निष्काम मैं, उदासीन मोहि जान
पार्थ कर्म बांधे नहीं, यही कर्म का ज्ञान।। 9।।

मैं अध्यक्ष, साकाश मम, प्रकृति रचा संसार
इसी हेतु इस चक्र में, घूमे जीव सजीव।। 10।।


परम भाव मम, ज्ञान नहिं, मूढ़ जना हे पार्थ
भूत महेश्वर जगत का, देह धरूँ संसार ।। 11।।

प्रकृति मोहिनी आसुरी, लिये व्यर्थ का ज्ञान
व्यर्थ आस विक्षिप्त चित्त, व्यर्थ कर्म, अज्ञान।। 12।।

देव प्रकृति के आश्रित, सदा भजे मम पार्थ
आदि कारण भूत का, नाश रहित मोहि जान।। 13।।

दृढ़व्रता भजेत सदा, यत्न कर करते नमः
ध्यान से जो युक्त हैं, नित्य प्रेम उपासते।। 14।।

अन्य मुझको ज्ञान से नित, एक भाव पूजन करें
अपर मुझको विश्व स्थित, पृथक भाव उपासते।। 15।।

अग्नि, हवन, घृत, यज्ञ में, मुझ को ही क्रतु जान
स्वधा औषधी मन्त्र मैं, हुतम् मुझे तू जान।। 16।।

धाता पिता माता जगत का, मैं पितामह हूँ स्वयं
ज्ञेय पावन प्रणव मैं हूँ, ऋक, साम, यजु वेद हूँ।। 17।।

गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, मैं निवास शरणम् सुहृत 
मैं निधान, कारण, अविनाशी,प्रभव प्रलय का वास।। 18।।

मैं तपता मैं बरसता मैं आकर्षण कर उसे
मैं अमृत मैं मृत्यु हूँ सत् असत् मोहि जान।। 19।।

यज्ञ पूज मोहि वेद विद, सोमरसी निष्पाप
चाह स्वर्ग निज पुण्य फल, स्वर्ग लोक को प्राप्त
देव भोग जो दिव्य हैं, भोगें सुन हे पार्थ।। 20।।

दिव्य स्वर्ग को भोगकर, पुण्य क्षीण मृत लोक
भोग कामी कर्म रत, आवागमन को प्राप्त ।। 21।।
जो सदा चिन्तन करें, और भजें निष्काम
योगक्षेम करता वहन नित्य युक्त मम नाम।। 22।।

जो सकाम श्रद्धा सहित पूजें देवी देव
वह भी मुझको पूजते जद्यपि विधि अज्ञान।। 23।।

सकल यज्ञ का भोक्ता, अरु स्वामी भी जान
जो मम तत्व न जानते पुर्नजन्म को प्राप्त।। 24।।

प्राप्त देव हों देव व्रत, पितर व्रती हों पितृ
भूत पूज कर भूत हो, मम पूजें मम प्राप्त।। 25।।

पत्र पुष्प फल तोय जो, प्रेम सहित अर्पित मुझे
उसे ग्रहण करता स्वयं, प्रेमार्पण धी शुद्ध का।। 26।।

जो करता जो खात है, हवन करे जो पार्थ
दान देत अरु तप करे, सब कर मम अर्पण सदा।। 27।।

शुभ   अरु अशुभ   कर्म से, मुक्त होय तू पार्थ
योग युक्त सन्यास से, मुक्त मुझी को प्राप्त।। 28।।

मैं सम व्यापक भूत सब, ना प्रिय द्वेषी जान
जो भजते प्रिय प्रेम से, वह मुझमें, तिन्ह माहिं।। 29।।

अनन्य भाव भज मोहि को, दूराचारी अति पार्थ
साधु जान निश्चय उसे, निश्चय उसे यथार्थ ।। 30।।

तुरत होत धर्मात्मा, परम शान्ति को प्राप्त
जान पार्थ निश्चित इसे, नहीं भक्त मम नाश।। 31।।

स्त्री,वैश्य, शूद्र अरु पापयोनि को प्राप्त
मम शरणागत जो हुए, परमगती को प्राप्त ।। 32।।

पुनः न संशय इस विषय,
शुचि  ब्राह्मण, ऋषि मम प्राप्त
नाशवान, सुख रहित देह में,
भजन मोर कर पार्थ।। 33।।

भक्त मोर बन तू सदा, मुझमें चित्त लगाय
मम पूजन कर प्रेम से, मुझे नमः कर नित्य।
युक्त चित्त होकर सदा, मम पारायण होय
एहि विधि मुझको प्राप्त हो, इसमें नहिं संदेह।। 34                                   


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