Thursday, October 6, 2011

गीता - Vasanteshwari - सत्रहवाँअध्याय-श्रद्धादर्शन योग -प्रो बसन्त


                दुःख दायक जो देह को और मूढ़ता जन्म
                जो हो पर के नाश को तापस तप वह जान।।

           सत्रहवाँअध्याय-श्रद्धादर्शन योग


श्रद्धा युक्त जो पूजते, त्याग शास्त्र विधि कृष्ण
उनकी निष्ठा कौन सी, सात्विक राजस तामसी ।। 1।।

श्रद्धा होती तीन विधि निज स्वभाव वश देहि
सात्विक तामस राजसी, सो मुझसे तू जान ।। 2।।

सत्त्व रज तम अनुरूप ही, सब में श्रद्धा जान
श्रद्धा मय यह पुरुष है, जो जैसा वह स्वयं है।। 3।।

सात्विक पूजें देव को, यक्ष रक्ष रज जान
प्रेत भूत को पूजते तामस जन वे पार्थ।। 4।।

त्याग शास्त्र विधि पुरुष जो, तपते तप में घोर
दम्भ अहं से युक्त वे, काम राग बल युक्त।। 5।।

कृष करते वे भूत सब देह और चित आत्म
मूढ़ भाव अस ये पुरुष, निश्चय आसुर जान।। 6।।

भोजन होता त्रिविधि प्रिय सबको निज अनुसार
दान यज्ञ तप भेद को, पृथक पृथक सुन पार्थ।। 7।।

आयु बुद्धि आरोग्य बल, बाढ़े सुख अरु प्रीति
रसमय चिकने थिर रहें, रूचिकर सात्विक प्रिय ।। 8।।

कड़वे तीखे अति गरम, अम्ल लवण अरु दाह्य
दुःख शोक अरु रोगप्रद, राजस प्रिय आहार।। 9।।



जो भोजन हो अधपका, रस विहीन दुर्गन्ध
बासी जूठा अशुचि  जो, तामस प्रिय है जान।। 10।।

मान्य शास्त्र विधि यज्ञ जो करना है कर्तव्य
मन निग्रह नहिं चाह फल वह सात्विक हे पार्थ।। 11।

दम्भ आचरण के लिए, किया जात जो यज्ञ
यज्ञ जान राजस उसे, फल इच्छा है मूल।। 12।।

हीन मन्त्र विधि अन्न के और दक्षिणा पार्थ
श्रद्धा हीन जो यज्ञ है तामस उसको जान।। 13।।

शौच  सरलता ब्रह्मचर्य और अहिंसा पार्थ
पूजन गुरू द्विज देवादि का, दैहिक तप सो जान । 14।।

वाणी प्रिय हित सत्य जो, नहिं उद्वेग को प्राप्त
स्वाध्याय जप ईश का वाणी तप है जान ।। 15।।

मन प्रसन्न अरु सौम्यता, आत्म विनिग्रह मौन
भावों की हो शुद्धता, मानस तप सो जान ।। 16।।

जो चाहे नहिं फल कभी, युक्त ईश के ध्यान
श्रद्धा कृत वह त्रिविधि विधि,सात्विक तप है जान।। 17।।

जो पूजा अरु स्वार्थ वश, दम्भ मान सत्कार
क्षणिक अनिश्चित फल प्रद, तप वह राजस जान।। 18।।

दुःख दायक जो देह को और मूढ़ता जन्म
जो हो पर के नाश को तापस तप वह जान।। 19।।

देना ही कर्तव्य है, अनुपकारी को देत
देश काल अरु पात्र हो, दान तू सात्विक जान।। 20।।

प्रति उपकार की कामना, फल की इच्छा साथ
क्लेश पूर्ण जो दान है, राजस है वह दान।। 21।।

दान बिना सत्कार के, देत निरादर पात्र
देश काल अरु पात्र बिन, तामस उसको जान।। 22।।

ऊँ तत् सत् यह त्रिविध हैं, ब्रह्म नाम कहलात
यज्ञ वेद ब्राह्मण रचे, सृष्टि आदि वह पार्थ।। 23।।

यज्ञ दान तप कार्य सब, ॐकार प्रारम्भ
शास्त्र विधि से ही नियत, वेद मंत्र उच्चार।। 24।।

यज्ञ दान तप कार्य सब तत् से कर आरम्भ
जिन्हें नहीं है कामना, मोक्ष भाव को प्राप्त।। 25।।

सत्य भाव अरु श्रेष्ठ में सत् का लेते नाम
पार्थ प्रशस्त कर्म में सत् प्रयोग को जान।। 26।।

यज्ञ कर्म तप दान में स्थित सत् को जान
यज्ञ निमित्त जो कर्म है सत् भी उसको जान।। 27।।

हवन दान तप कर्म शुभ  , असत् अश्रद्धा जान
नहीं लोक में फल मिले, नहीं मिले परलोक ।। 28।।

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गीता - बसंतेश्वरी - सोलहवाँ अध्याय-दैवासुरदर्शन योग-प्रो बसन्त


                 तीन नरक के द्वार हैं, काम क्रोध अरु लोभ
                 आत्म नाश करते यही, त्याग इन्हें तू पार्थ।।

       सोलहवाँ अध्याय-दैवासुरदर्शन योग


दो प्रकार के भूत जग, दैव असुर हे पार्थ
दैव प्रकृति वर्णन बहुत, असुर प्रकृति को जान।। 6।।

आसुर जन जाने नहीं, प्रवृत्ति  निवृत्ति  हे पार्थ
नहीं शौच, आचार है नहीं सत्य आधार।। 7।।

वे कहते यह जग सदा, असत् अनीश्वर अप्रतिष्ठ
जन्म परस्पर भोग से, कारण इसका काम।। 8।।

लिए सहारा दृष्टि यह, नष्ट आत्म मति मंद
क्रूर कर्म, अपकार रत, जगत नाश को जन्म।। 9।।

 आस असंभव आसरे, दम्भ मान मद युक्त
असत ज्ञान धारण करें, भ्रष्ट आचरण पार्थ।। 10।

नाना चिन्ता आश्रिता प्रलय रात्रि तक पार्थ
काम भोग रत नर सदा इतना ही सुख मान।। 11।।

काम क्रोध आधीन नर, बंधे आश के पाश  
काम भोग के हेतु को, संचय धन अन्याय।। 12।।

आज मुझे यह सब मिला, इस आसा को प्राप्त
इतना धन मम प्राप्त है, फिर होगा यह पास।। 13।।

मैंने मारा शत्रु  यह, और अपर भी हन्य
मैं ईश्वर भोगी सुखी, परम सिद्ध बलवान।। 14।।

मम सम दूजा कौन है, धन कुबेर बहु पूत
यज्ञ, दान अरु मोद करूंगा, मोहित है अज्ञान।। 15।।
चित्त भ्रमित बहु भांति से, मोह जाल आवृत्त
विषय भोग आसक्त अति, घोर नरक में जात।। 16।।

स्वयं श्रेष्ठ दर्पी पुरुष, धन मान मद युक्त
शास्त्र रहित पाखण्ड से, करे नाम का यज्ञ।। 17।।

दर्प कामना क्रोध बल और अहं मन माहि
निन्दा रत कर द्वेष मम, स्वयं अन्य बस देह।। 18।।

ऐसे द्वेषी नराधम, क्रूर अशुभ   रत कर्म
बार बार मैं डालता, अशुभ   योनि में पार्थ।।19।।

मुझे न पाते मूढ़ नर, असुर योनि बहु जन्म
फिर पाते अति नीच गति और नीच से नीच।। 20।।

तीन नरक के द्वार हैं, काम क्रोध अरु लोभ
आत्म नाश करते यही, त्याग इन्हें तू पार्थ।। 21।।

मुक्त पुरुष तम द्वार त्रय, करे आत्म कल्याण
वह पाता है परमगति और मुझी को प्राप्त।। 22।।

त्याग शास्त्र विधि जो चले, निज इच्छा अनुसार
नहीं सिद्ध को प्राप्त हो, नहीं परम गति प्राप्त।। 23।।

जान शास्त्र प्रमाण तू कार्य अकार्य प्रभेद
विधि सम्मत जो कर्म हैं, वही कर्म हैं योग्य।। 24।।






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